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Showing posts from January 12, 2016
कविता तब की जब "अना"नाम से लिखा पर "अना कासिमी से परिचय के बाद जाना की वो भी "अना है तब से मैं "अरु " नाम से लिख रही हूँ पैमाने और पैमानों के ऊपर कसी गई
जूनून -ए जंग ऐसा की मौत से लड़ गई कांच के महलों में ,ये दीवानगी हो गई
मेरी कहानी हर दरीचे को पता हो गई मैं रूह थी मेरा ना कोई मक़ाम रहा
ज़र्रे ज़र्रे , बिखरी और निखर गई देर से जाना, अपने हिज़र का अंजाम
सुबह होने तक मैं अपनी ज़बा खुद हो गई
क्या कहे "अना" अपनी हम तुमसे
खुद रोई मेरी दास्ता और फना हो गई आराधना राय "अरु"
Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार

बदल गए

नज़ारे बदल गए
किस्मत के सितारें बदल गए कितने चाहने वाले बदल गए
जिंदगी के हाथों वक्त के धारें बदल गए बंटवारें में घर मिरा लूट लोग निकल गए
आसबाब के साथ घर के लोग बदल गए चाहत के तूफान उठे दिल में
देख दरिया के साहिल भी बदल गए रो -रो कर मुझे बुलाने वाले
मेरी मईयत उठा कर बदल गए बस्ती दर्द और गम की क्या होती
रोतों पे "अरु" मुस्कुरा कर लोग बदल गए
©आराधना राय "अरु"

सच जीवन का

सच जीवन का सोच कर यही पाया ज़िन्दगी तेरे हाथ क्या आया उम्र भर खोजते है जिसको हम बता हाथ कि खाली लकीरों के सिवा क्या पाया एक पल कही खुशियाँ भी खिलौना है और कहीं गमगीन मातम पाया जिंदगी सोच तूने क्या पाया जुल्म करना जिनकी हो फ़ितरत रो कर उन के सामने क्या पाया आराधना राय "अरु"