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Showing posts from January 15, 2016

तमाशा हो गया

सौदा खुद बाज़ार में ये कैसा हो गया
 तमाशाई खुद यहाँ पर तमाशा हो गया

 कौन सा दिन कहर का नाज़िल हो गया
 लोगों की दुश्वारी से कोई परेशां हो गया

 दिल के जाने पर हादसा साथ हो गया
 साहिल पे कश्तियाँ डुबों शर्मिंदा हो गया

बयाँ कर सका ना कोई तकदीर हो गया
जिंदगी तेरे हाथों कोई निराश हो गया

सौ- मुश्किलें पड़ी दिल तार- तार हो गया
बस्ती के लोगों के लिए  कहकशां सा हो गया

अहसान फरामोश ही जब कारवां हो गया
फ़कीरी में रहना भी "अरु" इक नशा हो गया

©आराधना राय "अरु"