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Showing posts from September 6, 2016

नज्म चाँद रात

हाथो पे लिखी हर
तहरीर को मिटा रही हूँ
अपने हाथों  से तेरी
तस्वीर मिटा रही हूँ

खुशबु ए हिना से
ख़ुद को बहला रही हूँ
हिना ए रंग मेरा
लहू है ये कहला रही हूँ

दहेज़ क्या दूँ उन्हें मैं
खुद सुर्ख रूह हो गई

चार हर्फ चांदी से मेहर
 के किसको दिखला रही हूँ

सौगात मिली चाँद रात
चाँद अब ना रहेगा साथ

खुद से खुद की अना को
"अरु" बतला रही हूँ

आराधना राय "अरु"