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Showing posts from November 4, 2016

अतुकांत

धुप के गावं में
है बसेरा मेरा
हर साया है मेरा
हम साया मेरा
बागवा को ना
 कभी भरमाइए
रंग रूप चेहरा
मुक्मिल है
सब का यहाँ

रोज़ बातों से
मेरा दिल यूँ
ना बहलाइए

ये दीवानगी मेरी
कभी जाची नहीं
इस पर अपना
मुल्लाम्मा
ना चढ़ाइए

आराधना राय